गुरुवार, दिसंबर 28, 2017

साल अठरवां लागा रे



 बीतीं  बीस , सदी  इक्कसवीं ,
साल  अठरवां  लागा  रे !
खुली गहन  निद्रा  क्या  बोलो ,
इनसान सहज ही जागा  रे ?

उलटी छत पर पड़ी पतंग ,
टूटा जबसे  धागा  रे !
चिड़िया को बस दाना-दुनका , (पक्षी-गण सब भूखे -प्यासे )
मोती चुगता  कागा रे !
लो साल अठरवां लागा रे !!! 

समय सरित  का  भीषण  वेग ,
बह  गए  जाने  कितने साल !
उड़  गई कब सोने की चिड़िया ,
मेरा देश हुआ, इतना कंगाल !

लोकतंत्र में नित -नए  चोचले ,
हाय ! हमें  भरमाते  हैं !
उजले  वस्त्रों  में  नेतागण ,
सभी  कलंक  छुपाते  हैं !

रोजगार  की बाँट  जोहता ,
दर-दर युवा  भटक  रहा !
घोषणाओं  का बजे  ढिढोरा ,
जन -मानस  को  खटक रहा !

वो अच्छे दिन ,कब आएँगे ?
बन से कब लौटेंगे राम ?
इधर कुआं उधर खाई  है ,
सरहद  पर हर-दिन कोहराम !

बिना हवा के कबसे बोलो ?
ये कैसी उड़  रही  पतंग ?
चोर -चोर  मौसेरे  भाई ...
कैसे इनमें छिड़ गई जंग ?

वोट -नोट मुक्तक सब ,
चुनाव  में चुगता  कागा  रे !
बीतीं  बीस ,सदी  इक्कसवीं ,
साल अठरवां  लागा रे !

लो साल अठरवां लागा  रे !!!
_______________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति  



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