सोमवार, मार्च 28, 2016

डॉ. नारंग .....

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_____________________  डॉ . नारंग के लिए कुछ भी कहते या लिखते नहीं बन रहा .... कुछ भी नहीं .मन दुःख और देश की दुर्दशा पर जब कराहता है तब कहाँ कुछ कहा जाता है ! ..................कह ही तो रहा है देश का नेता -मंत्री और मिडिया , जी कहना उनका काम है . कहना उन ही का काम है !



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       जो चेहरे काले पोत दिए जाने चाहिए , जिन गर्दनों में फांसी का फंदा होना चाहिए , जिनके जिस्मों को जिन्दा जला दिया जाना चाहिए , इनकी पैदाइश या परवरिश पर भी प्रश्न हो सकता है . पर ......यदि ऐसा ना हो किसी नीति या राजनीति के तहत तब ? क्यूँ इन्हें यूँ छुपाकर रखा जाता है ? क्यूँ नहीं इन मुजरिमों के इश्तेहार इनसे पहले वहां पहुंचा दिए जाते , जहाँ से ये गुज़रते हैं , जिससे लोग सचेत हो जाएँ .......हर सज़ा इनके ज़ुर्म के आगे छोटी है.....काश वो माँ बाँझ होती ये जिनकी औलाद हैं .....बस दो ही तो जात हैं अब, एक मुज़रिम दूसरा गैर -मुज़रिम ! 

रविवार, मार्च 27, 2016

auto liker



             यश पिपासुओं की एक बड़ी तादाद गूगल पर ख़ोज रही है auto likers की link . चित्र उसी हवाले से है . सवाल ये है की, हम चाहते क्या हैं ? क्या सोचते हैं ? और करते क्या हैं ? आज शुरुआत है ,दूरगामी भविष्य में जब दुष्परिणाम सामने आएँगे हल तब ही खोजे जाने का रिवाज़ है . जबकि  ज़ुरूरत आज है ,क्योकि देश का युवा जब इस ओर लगा ,तभी उसे सही दिशा-निर्देश की दरकार है , वरना वक्त और उर्जा  की बर्बादी यूँ ही जारी रहेगी .

सोमवार, मार्च 21, 2016

कन्हैया ...


_____________ नामकरण ... फ़िर किया जाना चाहिए ? इसी तरह शब्द हमसे और हम उनसे खेलते हैं !
उफ़ ,एक मछली और उसने इतनी गंदगी फैला दी ? तालाब के भीतर भी , और बाहर भी ?
समाज ,साहित्य , धर्म , इतिहास , मनोविज्ञान और संगीत कोई इस नाम जुड़ा है तो कोई .....ये बहस - वार्ता - खबर - विरोध - का मुद्दा दिखाई देता है , पर दरअसल ये नस्ल को चाटने आई उस घुन के होने का संकेत है ,जो  हमें नुकसान देने आई है ,और हम सचेत हो गए :)
ये मन का धन नहीं ---- हर बुराई से जन्म लेने वाली भलाई का उदाहरण बन सकता है अगर हम वक्त रहते सही फ़ैसला कर सकें तो ! 

रविवार, मार्च 20, 2016

सिंड्रेला ...


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        जब पहली बार उसे सुना तब बहुत रोना आया - ओह ! कितनी ख़राब होती हैं सौतेली मां और बहनें , बेचारी सिंड्रेला ! ये बहुत पहले की बात है , तब  मैं उतनी बड़ी नहीं थी . उतनी यानि सिंड्रेला जितनी :) मुझे घर के काम नहीं आते थे . ज़ुरूरत भी नहीं थी . मेरी मां तो मेरी अपनी थी , बहनें भी सौतेली नहीं थीं .लेकिन मैं दु:खी थी सिंड्रेला के लिए !
-------------- फ़िर धीरे -धीरे दूसरी कहानियाँ आई और मैं उसे लगभग भूल ही गई , मगर .....अचानक ...एक दिन वो मुझे फ़िर याद आई ,अब मैं उससे बड़ी थी , मैं कोलिज की पढाई कर रही थी . इस बार मुझे जैसे ही वो खुबसूरत  पारदर्शी  पादुकाएँ दिखीं , मुझे वो याद आई ! जाने किस ख्याल या कहूँ की ख़्वाब के तहत उन्हें मैंने खरीद लिया ...... अब मैं उसे याद करके दु;खी  नहीं हूँ!तो क्या एक ही कहानी ....उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर ,अलग असर डालती है .... मैं जब भी उसे याद करती हूँ ,हर बार कुछ अलग .... यानि ये कहानी मुझसे जाने कितनी कहानी लिखवाने की ताकत रखती है :)
____________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति




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