रविवार, दिसंबर 25, 2016

सलीब पर .....

ज़िन्दगी ने
जो मुझे दिया
ख़ुशी से लिया !

 पियाला भर
जहर
उमर भर  !

पिया  मैंने
बूंद -बूंद
जिया मैंने !

न जीने से
डर ....
नहीं
मरने की
 फिकर !

विष कभी
कर देता
किसीको
 अमर !

जिसे समझे
मृत्यु
किसे  समझे !

न विलाप
ना मातम
क़िस्सा शुरू
या खतम

मुक्ति
नही मिलती
जीवन से
गम  से
पुनर जनम से

अमृत घट
फ़िर वही कपट

इस वर्तुल में
उपक्रम से
सब मिलता है
नियति नट
जीवन संकट

फ़िर भी
मृत्यु से  डर
मांगता वर
हुआ कोई अमर
रे अंत को वर
ख़ुश होकर
फ़िर ..
शुरुआत कर !
चढ़ सलीब पर ...........
__________________ डॉ . प्रतिभा  स्वाति










सोमवार, दिसंबर 19, 2016

अभिषेक शुक्ल .....














      एक लेखक जैसे पारस ! जिसे पढ़कर पाठक बन जाए सोना ! सचमुच ये तारीफ़ नहीं ...आज की नस्ल में ,ये हुनर ख़ुदा सबको नहीं बक्श्ता ! मेरा  प्रिय अनुज :) शुभकामनाएँ !!!

शनिवार, दिसंबर 17, 2016

बंधे हुए हैं हम ..... तिलिस्म से














देखिये .....
क़िस्म - क़िस्म  से ..
बंधे  हुए हैं 
हम 
तिलिस्म से !

फूल - खुशबू 
बहार से !
उम्र भर भ्रम
रिश्तों में ...
प्यार  से !

आस्था ... ईश्वर 
साकार ..या 
निराकार से !
आडम्बर  भी ...
अहंकार  से !

अनुभूतियों  से ...
अभिव्यक्ति  से  !
हाँ ... वही 
मन और 
 ज़िस्म से .....
आजीवन ..तिलिस्म से !

देता  है जन्म 
वो ...
हरता है प्राण 
वो ...
सब वही है 
मगर 
फ़िर भी वो 
नही है पर ...

प्राण जब मुक्त
हो रहे बिदा 
जहान से ...
आए तो उल्लास 
जा रहे हो 
अनजान से ...

जमीन से ...
आसमान  से ..
विहान से ...
मान  से ...
ध्यान  से ...

रह गए वृथा 
सम्बन्ध
 सारे सर्वथा ...

 प्राण - मुक्त 
जिस्म से ....
हुए मुक्त 
तिलिस्म से .....
__________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति











__________

मंगलवार, दिसंबर 13, 2016

प्यार खत्म होते ही ......


संस्कार  खत्म 
होते ही .....
प्यार खत्म 
होते ही ....
उसकी जगह 
लेता है दौड़कर ,
स्वार्थ .....
 वैमनस्य ....
षडयंत्र .....
इनसे कभी भी ,
कहीं भी ...
सृजन नहीं होता !
होता  है विनाश ......

तब ... हो जाती है 
जमीन बंज़र !
रोता  है ..आकाश !
दहकती है ...
सिर्फ़ ... आग़ !
चलती है आंधी ..
नफ़रत की !
सब ...  विलुप्त ...
सब.... ख़ाली ...
पंच - तत्व विहीन ..
उस ही में लीन !

फ़िर ...
 बंज़र जमीन पर
पनपने लगती है 
नपुंसक भीड़ ....
जिसकी नहीं होती 
कोई जड़ ...
नहीं फूटती जिसमें 
कभी / कोई 
ख़ुशी की कोपल !
उपलब्धि के पुष्प !
होते हैं सिर्फ़ 
कंटक ...
अभिलाषा  से ...
उपजे इस 
शोर के शिखंडी ने 
मौन से जन्मे 
चिन्तन के भीष्म 
के ख़िलाफ़
 साजिश में फ़िर 
की है  शिरक़त ....
बज रही है 
दुन्दुभी ...फ़िर से 
विनाश की .....
भीड़ को रहती है 
तलाश ... सिर्फ़ 
एक भेड़ की ........ !!!
__________________ डॉ.प्रतिभा स्वाति


 









गौरव पाण्डेय की कुछ कविताएँ....











_______ गौरव fb पर हैं .... बहुत पुनीत और मधुर सोच रखते हैं , उनकी रचनाओ में गंगा का प्रवाह है ! शुभकामनाएँ !




सोमवार, दिसंबर 12, 2016

कुत्ता मुक्त भारत.....






कई दिन से सुरक्षा के मद्दे नज़र दरवाजे पर कुत्ता भौंकता रहे ये मंशा थी ....
पड़ोसी बोला ..... 
 शेर के ख़िलाफ़ शेर लिखके तख्ती   टांग दीजिये .....फ़िर देखिये ....भौं - भौं शुरू हो जाएगी 
.a
.
चलो प्रधान   कहीं तो काम आए ....
लीजिये बन गया .....  कुत्ता मुक्त  भारत 
---------------- जयहिंद

वो बस मुस्कुराता है .....


 वो ..... जो 
सन्यासी है 
बस ...
मुस्कुराता है !
आता है ....
चला जाता  है !
अक्सर....... 
समझाता  है !
जीवन के रहस्य 
हास्य - क्लेश 
संघर्ष - द्वेष 
मोह -माया ....सब !
उसने  सब छोड़कर 
ओढ़ रखी है 
एक ....
मृदुल -  शांत 
ठहरी सी मुस्कान !
गहरी सी मुस्कान !

वो यहाँ नहीं रहता 
इस भीड़ और 
शोर -  शराबे में !
यहाँ के दंगे ,और
खून -खराबे में !

दूर उस निर्जन में 
आख़िर ....
क्या  है ?
उसके मन में ?

वो क्यूँ आता है ?
मुस्काता है ...

भीड़ ... बढ़ रही है 
अब उसकी तरफ़ ...
अब वो नहीं आता !
आगे ...और आगे 
एकांत में ...
खो जाता है ...

भीड़ ख़ोज रही है 
उस इनसान को ...
बियाबान को ...

वो मिल जाता है 
फ़िर मुस्काता है !
फ़िर समझाता है !
लौटो .... लौट जाओ 
 भीड़ लौटती है ...
  भरे मन से ...
 हर कोई ...तबसे
बदल गया  है ...
हर कोई मुस्काता है 
वो ...सबको
अपनी .... वही 
 तिलस्मी मुस्कान 
दे जाता है .....
वो ... रोज़ 
याद आता  है !
रोज़ .....
याद किया  जाता है !

गढ़ दिया है चरित्र !
देखो .... किसे 
पसंद आता  है ...
और .... कौन 
अपनाता  है ...
मुस्काता है ...
समझाता  है ...
आता  है...
चला  जाता  है ...
_________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति






शनिवार, दिसंबर 10, 2016

स्त्री नहीं सहती .....


जुल्म और ज़ुर्म 
सदियों से 
जो हो रहे हैं .....
कौन चाहता  है ?
कौन कहता  है ?
और 
कौन सहता  है ?
हम और तुम ....
हम सब ?
पर ...
कौन करता है ?
वो ... वो ,या फ़िर वो !
बच्चे और बुज़ुर्ग ...
नादां हैं बच्चे 
बुज़र्ग लाचार  हैं 

शेष स्त्री और पुरुष 
करते हैं विरोध 
कभी खुलकर 
और कभी 
दबी ज़ुबान से 

स्त्री चीखती हैं 
पर 
उसकी महीन आवाज़ 
उलझ जाती है 
घर के चौके - चूल्हे से ...

या फ़िर आंगन की 
तुलसी पर 
थम जाती है 
इस पर भी अगर
शेष है आवाज़ 
तो हो जाती है 
बस पर सवार 
और दफ्तर तक 
पहुंचकर 
बेसाख्ता .... बीमार 
पर फ़िर भी आवाज़ 
शेष  है ....
जो दब जाती है 
विकृत .... नपुंसक 
पुरुष के दुराचार 
और अनाधिकार 
की भर्राहट में...
--------------------- डॉ . प्रतिभा स्वाति

ज़ुर्म के ख़िलाफ़ .....


18 घंटे में 210 लाइक और 36 share का मतलब ?




गुरुवार, दिसंबर 08, 2016

जीवनपथ .....




_______________  समय सवार .....
                         इस रथ पर !
                         रहो  सजग ...
                         जीवनपथ पर !
_______________________ डॉ.प्रतिभा स्वाति





बुधवार, दिसंबर 07, 2016

देवदूत द्वार पर .....


 मृत्यु शाश्वत  सत्य है ....
किसलिए  विलाप  हो ?
पापमय हो जीवन अगर....
 फ़िर क्यूँ न पश्चाताप हो ?
_____________ डॉ .प्रतिभा स्वाति

रविवार, दिसंबर 04, 2016

कबीर ....

गूगल से साभार 




दोहा   – या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत | गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत |
अर्थ   – इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो | सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं |
 दोहा   – गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह | आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ||
अर्थ   – जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा | नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो |
दोहा   – कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव | स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर  पूछै नाँव ||
अर्थ   – अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान  पर भी मत जाओ | क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे |
    दोहा   – देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह | निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह ||
अर्थ   – मरने के पश्चात् तुमसे कौन देने को कहेगा ? अतः निश्चित पूर्वक परोपकार करो, यही जीवन का फल है |
दोहा   – या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत | गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत ||
अर्थ   – इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो | सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं |
कबीर दोहा  – ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय | औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय ||
हिन्दी अर्थ  – मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो |
दोहा   – गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह | आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ||
अर्थ   – जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा | नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो |
दोहा   –  धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर | अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर ||
अर्थ    – धर्म (परोपकार, दान सेवा) करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं | धर्म करके स्वयं देख लो |
दोहा  – कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय | साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय |
अर्थ   – उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर | साकट (दुष्टों)तथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो |
दोहा  – कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत | साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत ||
अर्थ – गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो | क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’ ||
दोहा   – जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय | जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय ||
अर्थ   – ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा | अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो |
दोहा   – कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव | स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर  पूछै नाँव ||
अर्थ   – अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान  पर भी मत जाओ | क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे |
दोहा   – इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति | कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति ||
अर्थ   – उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहाँ पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए |
दोहा   – कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर | इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर ||
अर्थ   – सन्तों के साधी विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का  दल जब परिपूर्ण रूप से ह्रदय में आया, तब सन्तों ने इद्रियों को रोककर शरीर की व्याधियों को धूल कर दिया | अर्थात् तन-मन को वश में कर लिया |
दोहा   – गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै | कोटी सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परे || कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै | गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै ||
अर्थ    – यदि अपने ह्रदय में थोड़ी भी सहन शक्ति हो, ओ मिली हुई गली भारी ज्ञान है | सहन करने से करोड़ों काम (संसार में) सुधर जाते हैं, और शत्रु आकर पैरों में पड़ता है | यदि ज्ञान ह्रदय में आ जाय, तो मिली हुई गाली से अपनी क्या हानि है ?




शनिवार, दिसंबर 03, 2016

काला धन होता ...


काश की....... मेरे पास भी ,
सखि होता थोड़ा काला धन !
दीनहीन में...... जा बांटती ,
ख़ुश होता मुझसे हर निर्धन !
_______________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति




गुरुवार, दिसंबर 01, 2016

अमित मुनि की रचनाएँ .... fb से












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