शनिवार, नवंबर 16, 2013

रात और मैं

*************************************
रात  क्यूँ ख़ामोश है ?
चाँद को क्यूँ रोष  है ?
पूछिये ज़रा !
सितारे  मद्धम  क्यूँ हैं ?
आसमां को गम क्यूँ है ?
पूछिये  ज़रा !
क्यूँ जागते  हम हैं ?
आँख  क्यूँ नम  है ?
पूछिये  ज़रा !

वो  जो जिया  करते हैं ,
तनहाई  में अक्सर !
वो जो सिया करते हैं ,
दामन् अपना छुपकर !

हम दर्द-ए-दिल के ,
खुशमिज़ाज़ साजिन्दे !
बाद्शाहों की मानिंद ,
दिखा करते हैं अक्सर !

तुम रातों को सोने वाले ,
क्या जानो राज़ गहरे हैं !
कहने को कह डालूं लेकिन,
ख़ुद बिठाए  ये पहरे हैं !
------------------------------ डॉ . प्रतिभा स्वाति
**************************************** 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...